मंगलवार, 10 जनवरी 2012

"भाषणों की हकीकत "

शहर में इन दिनों चुनावी माहौल की सरगर्मियां दिखने लगी है। चाय की दुकान से लेकर रसोई घर तक में चुनावी समीकरण पर चर्चा हो रही है। चौराहों पर पोस्टर और लाउड स्पीकर की आवाज भले ही सुनाई नहीं दे रही लेकिन चौराहों पर इकठ्ठा लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशी की खूबियाँ बताने में लगे हुये हैं। राहुल की गोरखपुर मंडल से चुनावी यात्रा ख़त्म होने के बाद से चुनावी बयार में तेजी दिखने लगी है। अब लोग नेताओं के चुनावी भाषण पर चर्चा करने लगे हैं।
कचहरी चौराहे पर मंगलवार दोपहर कुछ लोग इकट्ठे हो कर यहां के चुनावी माहौल पर चर्चा कर रहे थे। इनमे कुछ लोग ऐसे थे जो अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा को जीत दिला रहे थे। वहीँ कुछ युवक राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ने के पीछे राहुल का हाथ बता रहे थे। इन नौजवान युवको का कहना था कि राहुल के आने के बाद से राजनीति में युवा लोगों का रुझान बढ़ा है। कांग्रेस ने युवाओं को टिकट देने की शुरुआत की तो सूबे में मौजूद सभी पार्टियों ने युवाओं को अपनी पार्टी में मिलाना शुरू कर दिया।आज हर पार्टी के चुनावी अजेडे में युवाओं को रोजगार दिलाने और देश में मंहगाई को समाप्त करने की बातें शामिल कर ली गयी हैं।
इसी बीच राहुल के भाषण को लेकर बहस छिड़ गयी। चौराहे पर मौजूद कुछ लोगों को राहुल का भाषण बहुत पसंद आया, कुछ लोगों का कहना था की राहुल ने हर बार की तरह रटा रटाया बयान दिया। उनके बयान में कोई नयापन नहीं था। भाषण देते समय ऐसा लग रहा था की राहुल किसी की लिखी पंक्तियों को पढ़ रहे हैं।इनकी बातें सुनकर मेरे दिमाग में भी बिजली कौंधी की हाँ यार राहुल की जितनी भी सभाओं की कवरेज मैंने की है। उनमे राहुल ने हर जगह एक जैसा ही बयान दिया है, अगर कुछ पंक्तियों का हेर फेर कर दिया जाये तो ऐसा कुछ भी नहीं था जो राहुल ने पिछले दो साल में नया कहा हो।
गौर करने वाली बात है की युवा शक्ति का नेतृत्व करने का दम भरने वाले राहुल के पास जब अपने शब्द और अपना बयान नहीं है तो फिर वो युवा को किस तरह देश की दिशा बदलने में सहयोग करेंगे। राहुल और अखिलेश की चुनावी यात्रा का लाभ उनकी पार्टियों को हो ना हो उत्तर प्रदेश की जनता अब चुनावी भाषणों की हकीकत समझने लगी है।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

"Dard har kisi ko hai"

देश में हर तरफ अंतर्द्वंद का माहोल है, पढ़े लिखे और अनपढ़ सभी अन्ना की बात कर रहे है.

बंद कमरे, बैठक और गाँव की चोपाल में भ्रष्टाचार मिटाने के तरीको पर बहस हो रही है.

बुद्दिजीवी इसे पब्लिक का सपोर्ट पाने की और असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश बता रहे हैं.

आम आदमी इसे मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी और भ्रष्टाचार से मुक्ति के रस्ते के रूप में देख रहा है.

मीडिया इसे बेहतर मसाला मान कर समाचार परोसने में लगा है.

किचेन से लेकर खरीदारी तक अन्ना के आन्दोलन का असर दिख रहा है.

बच्चे स्कूल जाने में हीलाहवाली कर रहे है, मम्मी खाना बनाने में, पापा आफिस जाने में.

ऐसे में बासी सब्जी बन चुके बुजुर्गों का मार्केट मूल्य बढ़ गया है.

हर मोहल्ले और गाँव में बुजुर्गों से उनके ज़माने के किस्से सुने जा रहे है,

इन तमाम चीजों के बीच दिल में एक टीस सी उठती है,

जो हर बार की तरह जुबान तक आकर दम तोड़ देती है,

मगर फुसफुसाहट के साथ इतना सुनने में आता है-'जाके पैर न फटी बिवाई सो का जाने पीर पराई'

ये बात कहने वाला अब कोई नहीं, हर किसी को दर्द का एहसास है. सभी बदलाव चाहते है,

मैं देश में अपेक्षित बदलाव और युवा शक्ति को विकास के अनंत पथ पर अग्रसारित होने की कामना करता हू,

हमारा आने वाला कल बारिश की घनघोर घटा के बाद निकले सूरज की तरह चमकदार होगा, उसमे चन्द्रमा की तरह दाग नहीं होगा...


शनिवार, 19 मार्च 2011

" बरेली की होली "


इस बार की होली हमने बरेली शहर में खेली। यह देश का ऐसा शहर है जहाँ होली के मौके पर रामलीला और राम बारात का आयोजन होता है। तरह-तरह की वेश भूषा पहने लोग टबों में रंग भर कर गाड़ियों पर चलते है। इन्हें रस्ते में जो भी मिलता है उसे होली के रंग से सराबोर करते चलते हैं।

बरेली में होली के अवसर पर रामलीला के आयोजन का इतिहास २०० साल पुराना है। इसमें यूपी और विहार के कई जिलों के कलाकार रामलीला का मंचन करने आते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत रामचरित मानस पर रामलीला का मंचन है, जिसमे मशहूर कथावाचक राधे श्याम जी के बोल आज भी प्रचलित हैं। राधे श्याम जी जीवनभर रामलीला में भाग लेते रहे। उनकी मौत के बाद भी उनके दिए गए बोल बरेली की रामलीला में समाये हुए हैं..

बमनपुरी मोहल्ले से निकली राम बारात पुरे शहर भर में घूमी। इसे यहाँ के लिए लोगों ने झरोखे से देखा और छत पर खड़े हो कर मजा लिया। कुछ भी हो बरेली की राम बारात में म्यूजिक मस्ती और धमाल के अलावा केवल सडको पर होली का इन्द्रधनुषी रंग दिखाई दे रहा था..............होली है.................

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

"वो दो हजार "

दे दना दन मूबी में हीरो कहता है- तू पैसा- पैसा करती है, पैसे पर क्यूँ मरती है॥
ये गाना रिश्तों की असलियत को उजागर करता है। । यह भी पता चलता है की पैसे की अहमियत कितनी ज्यादा है॥ हम बेहतर जानते हैं की आज के भौतिकवादी युग में पैसा हर किसी के लिए अमूल्य चीज हो गयी है.
हो भी क्यों ना, एक रूपया कम होने पर दुकानदार सामान देने और गाड़ी वाला आगे ले जाने से मना कर देता है। ऐसे में अगर बात दो हजार रुपयों की हो, पैसे देने वाला पुराने ज़माने की फिल्मो के लाला की तरह हो, फिर उससे पैसे निकलवा पाना भी bahut मुस्किल kaam है।
जनाब कुछ इसी तरह की उधेड़ बुन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पीजेबीसी के 61 स्टुडेंट्स है, जो दो साल पहले जमा की गयी कासन मनी के लिए डिपार्टमेंट के चक्कर लगा रहे है। बाबू को फ़ोन करने पर जवाब मिलता है आप का पैसा जल्दी ही मिल जायेगा दस्तखत होना बाकी है लेकिन बाबू कोई टाइम नहीं।
उसकी इन हरकतों ले तंग आये हमारे एक मित्र का कहना है- हम केवल इसी आश में जिन्दा हैं कि हमारे हिस्से के वो 2000 रुपये जल्द ही मिलेंगे जिन्हें २०१० में देने का वडा किया गया था । उनका कहना है कि बिना 2000 हजार लिए मर गए , फिर उनकी आत्मा भटकती रहेगी, वो भी सेंटर encharge के आवास के आस - पास । हाय रे वो २००० हजार रुपये जो न ही चैन ले जीने देते हैं न मरने.....

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

"इंसानी आक्टोपस "

दुनिया के इस बाजार में हर कोई बिक रहा है.
फर्क इतना है कुछ घरों के अन्दर बिक रहे है, तो कुछ सरे राह.
मंजिल सबकी एक है, ज्यादा से ज्यादा खून चूसकर पैसे इकट्ठा करना.
ज्यादा से ज्यादा जिश्म का दिखावा करके पॉपुलर होना.
लाशों का ढ़ेर लगा हो कदमों के नीचे किसी को गम नहीं,
उन्हें पता है कि लाशें तो हर रोज जलती है, मगर वो लाशों के ढ़ेर पर खड़े है अर्थात वो जिन्दा है.
दिल तो हर रोज टूटता है, कभी बीबी की डांट पर तो कभी बॉस की झिड़की पर.
मगर असली दिल तो तब टूटता है, जब रोने का जी चाहे और आंखे पथरा जाएं.
कुछ इसी तरह रोने का मन होता है, जब दुनिया के दस्तूर की आड़ में लोग धोखा देकर मुस्कुराते है.
सर्वाइवल आॉफ दि फिटेस्ट के नाम पर मुस्कुराकर लहू चूसते हैं....
शायद इसीलिए इस दुनियां में रीयल आक्टोपस और भेड़िए खत्म होते जा रहे है.
उनकी जगह इंसान रूपी आक्टोपस और भेड़ियों ने ले ली है.

सोमवार, 21 जून 2010

खामोश दिल

इतवार को बरेली शहर में चौपुला ओवर ब्रिज के पास एक-एक कर पांच गाड़ियां आपस में भिड़ीं। इस हादसे में कुल दो लोगों की जान गई और सात लोग घायल हो गए। गाड़ियों की भिड़त का मंजर इतना खतरनाक था कि इसे देखने के लिए हजारों की भीड़ इकट्ठी हो गई। वहां मौजूद हर किसी का बगल वाले से एक ही सवाल था। एक्सीडेंट कैसे हुआ, अंदर कितने लोग फंसे हैं। बस के नीचे फंसी बाइक को देखकर पूछता, यह बाइक किसकी है। बस और दीवार के बीच में फंसे इस दो लोगों को किसी तरह निकालो नहीं तो वे मर जाएंगे। इस हादसे की वजह से पूरी रोड जाम हो गई थी। लोगों ने पुलिस कन्ट्रोल रूम फोन करके सूचना दी. उसके आधे घंटे बाद पहुंची पुलिस की गाड़ी से निकले जवान पब्लिक की तरह तमाशा देख रहे थे। भीड़ में कुछ ही लोग थे। जिनके दिल ने उन मरने वालों को बचाने के लिए आगे बढ़ने की इजाजत दी थी. बाकी लोगों के दिल पत्थर के थे। उनके अंदर उत्सुकता थी लेकिन अपने सही सलामत हाथों से किसी की जान बचा लेने का ख्याल नहीं था।
रूहेल खंड डिपो की जिस गाड़ी की वजह से टक्कर हुई उसके ड्राइवर का कहना है कि गाड़ी का ब्रेक फेल हो गया था। इस वजह से स्लोप से उतरते समय वह गाड़ी कन्ट्रोल नहीं कर सका और आगे जा रही डीसीएम से जा भिंड़ा। उसके बाद डीसीएम ने ट्रैक्टर में टक्कर मारी, ट्रैक्टर ने आल्टो में , आल्टो ने वैगन आर में एक-एक कर लगातार पांच गाड़ियाँ आपस में भिंड़ गईं। इस मंजर को देखकर बस के ड्राइवर ने घबराहट में अपनी गाड़ी लेफ्ट साइड में मोड़ दी। जिसकी वजह से लेफ्ट में बाइक सवार दो लोग उसकी चपेट में आ गए। वे बस और दीवार के बीच में फंस गए। उनकी चीखों से आस पास के घरों में गर्मी से राहत पाने के लिए छिपे लोग भी बाहर आ गए। इतनी तेज और कड़क घूप में भी लोग छतों और पेड़ों पर चढ़कर इन गाड़ियों के नीचे फंसे लोगों को तड़पते देख रहे थे। गिने चुने दस लोग थे जो फंसे हुए लोगों को निकालने में लगे हुए थे। हाथों और रस्सी का जोर लगाकरगाड़ी को तिरछा करके फंसे हुए लोगों को निकलने की बहुत कोशिश की गई मगर बस के नीचे फंसे हुए लोग नहीं निकल पाए। फंसे हुए जिन लोगों के शरीर में थोड़ी बहुत हरकत हो रही थी। आधे घंटे बाद वह भी बंद हो गई।
आखिरकार क्रेन मंगाई गई और उसमें फंसाकर बस को आगे खींचा गया। तब जाकर उसके नीचे फंसे लोग निकले। घायलों को एंबुलेंस में बिठाकर पास के एक नर्सिंग होम में ले जाया गया। जहां घायलों और उनके परिवार वालो की चीख पुकार से पूरा वार्ड कराह रहा था। मैं भी इन सारी घटनाओं के बीच मौजूद था। हर दर्द, हर चीख, हर पुकार को देख और सुन रहा था, उसे महसूस कर रहा था। इतने सब के बाद भी मेरी आंखें नम नहीं हुई। कलेजे में इनके लिए कुछ न कर पाने की टीस भी नहीं उठी। मैं पूरी तरह खामोश था। एक मशीन की तरह अपना काम किए जा रहा था। रात में सोते समय दिल से एक आवाज निकली अब तू भी दुनियां के प्रोफेशनल लोगों में शामिल हो चुका है। जिनके लिए अपने काम से इतर किसी चीज से कोई रिश्ता रखना बेमानी होता है।

मंगलवार, 18 मई 2010

अपना शहर

आप महीनों बाद अपने शहर की सड़कों पर चला। ऐसा लगा जैसे बरसों बाद मां के आंचल की घनी छांव नसीब हुई है। सब कुछ भूलकर मैं चैन की नींद सोया। आंखें खुलने के बाद एक अनोखा तेज और स्फूर्ति अपने अंदर महसूस हुई। कदमों में मीलों चलकर थकने का एहसास नहीं था । आंखों में नई चमक थी। पेड़ों की पत्तियों और पंक्षियों के कलरव में नई ताजगी नया आकर्षण था। इतना मनोहारी दृश्य इससे पहले देखा नहीं या मेरी आंखों ने देख कर अनदेखा कर दिया था पता नहीं, मगर सच में आज अपने शहर में घूमने का एहसास शब्दों में बयां कर पाने में खुद को असफल महसूस कर रहा हूं......अपने शहर का अपनापन दुबारा पेट की खातिर शरहद को पार न करने की याचना कर रहा है। मगर हर बार की तरह इस बार भी मैं उसे जल्दी ही वापस आने का भरोसा दिलाकर निकल रहा हूं। मुझे पता है, वह मान जाएगा। मेरे जाने के बाद रोएगा, पेड़ की डालों से , पंक्षियों से मेरे साथ गुजारे गए पलों की यादें बांटेगा। तब तक गांव की तरफ आने वाली पगडंडी पर अपनी पलकें बिछाए रखेगा, जब तक मैं दुबारा उससे मिलने अपने गांव अपने शहर नहीं आ जाता॥

एहसास

बंद कमरे की घुटन में भी सांसों को तेरे आने का एहसास था। चारदीवारी के हर रंग में तेरा हंसता चेहरा दिखता था। जब मेरे बाप के गरीब होने की सजा मुझे बंद कमरे में दी गई, तब अपनी मौत से ज्यादा तुझे खोने का एहसास था। मैं गरीब की बेटी थी, इसलिए मुझे जलाया गया। मगर तेरा क्या कसूर था, जो पैदा होने से पहले ही मेरी कोख में तुझे जला दिया गया।
हर रोज पिट कर, ताने सहकर, तुझे जिन्दा ऱखा, क्योंकि तेरी आहट में अपनी नई जिन्दगी का एहसास नजर आया था। मुझे जलाया गया, मुझे सताया गया, मगर इन सारे दुखों से हटकर मेरी कोख में तेरे आने का एहसास था। तभी तो मैने उपर जाकर भगवान से पूछा था, कलेजा ठण्ढ़ा हो गया......वो घंटों चुप रहने के बाद बोला था, तेरी तरह अब मैं भी मजबूर हो चुका हूं। उसकी आवाज में भी एक मां की तड़प और इंसानियत का एहसास था..............

सोमवार, 17 मई 2010

अपना शहर

आज अपने शहर की सड़कों पर चलते हुए जो शुकून र एहसास हुआ, वो अब से पहले कभी नहीं हुआ था। ऐसा लगा जैसे बरसों बाद मुझे मां का आंचल मिला हो। अपने सारे दर्द सारे गम भूलकर मैं चैन नींद सो रहा हूं। तभी िकसी सी आहट ने उसके आंचल की छांव को मुझसे दूर कर दिया।

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

तेरी याद

दुनियां में शायद ही ऐसा कोई शख्स हो जिसने कभी किसी से प्यार न किया हो ! प्यार करने वाला अपने जिन्दगी के हर हसीन, यादगार, खुशनुमा और गमगीन मौके पर अपने उस प्यार को याद करता है। अपने प्यार को याद करके एक पल के लिए वो दुनियां के बीच रहते हुए भी खुद को अकेला महसूस करता है। यह अकेलापन खुशी और गम दोनों साथ लेकर आता है। खुशी तब मिलता है, जब आशिक अपनी दोनों आंखें बंद करके अपने प्यार को अपने सबसे करीब,यहां तक की अपनी सांसों में महसूस करता है और गम तब होता है, जब वो अपनी आंखे खोलता है और खुद को सारी दुनियां के बीच अपने प्यार के बिना पाता है।
मित्रों प्यार के इस खट्टे मीठे एहसास का अपना एक अलग ही मजा होता है। इस बार वैलेनटाइन डे के दिन मेरी मुलाकात कई ऐसे आशिकों से हुई, जिन्होंने अपना पिछला वैलेनटाइन डे अपने वैलेनटाइन के साथ मनाया था। मगर इस बार दोनों एक दूसरे से दूर थे। लेकिन इन दूरियों के बावजूद भी उनका प्यार कहीं से कम नहीं हुआ था। एक तरफ मोबाइल पर पल्स रेट बढ़ती जा रही थी, दूसरी तरफ इन आशिकों के चेहरे के गंगा, यमुना की तरह आंखों से आंसू निकल रहे थे। दिल के जज्बात बयां करते समय इनके चेहरे के भाव सच में दिल को िपघला देने वाले थे। शुक्र है, इस मोबाइल का जिसने दूरियां मिटा दीं और रिलायंस की भाषा में दुनियां को मुट्ठी में कर लिया।
इन आशिकों के जज्बात और यादों की तरन्नुम ने मेरी कलम को भी धार दे डाली। मुझे भी अपना पुराना प्यार याद आ गया। बस फिर क्या था, मैने भी अपना टिपैया यंत्र उठाया और उनकी याद में एक कविता लिख डाली। पेश है आपके सामने वो कविता जिसका शीर्षक है-
तेरी याद
जिन्दगी में हर पल वो मेरे साथ रहता है,
यादों में ही नहीं वो मेरी सांसों में भी रहता है।
उसकी याद में गिरते हैं,जब भी मेरी आंख से आंसू,
वो नजर में ही नहीं, मेरे आंसुओं में भी दिखता है।
कल तक वो मेरे जीने का सबब था,
लेकिन आज वो जिन्दगी से कुछ अधिक लगता है।
सपनों में जुदा होकर मौत प्यारी लगती है,
मुलाकात की एक ख्वाहिश में जिन्दगी का भरम लगता है।
उसकी खामोशी मुझे घुटन सी लगती है,
उसका हंसना मुझे एक नया जीवन लगता है।
जब भी चलती हैं, ये ठण्ढ़ी हवाएं,
उसका आंचल हले से ही सही,पर मुझे ढ़कता है।
जब वो रोती है, मुझे याद करके,
उसे क्या पता, दूर होकर भी मेरा दिल, उसके पास धड़कता है।
मुझे इन शब्दों में एक चेहरा नजर आता है,
तन्हाई में उसकी यादों के साथ अपने सपनों का घर नजर आता है।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

काश ! मैं भी इसी दिन पैदा होता

हमारे भारत की बढ़ती जनसंख्या नें पूरे विश्व की मर्दानगी पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। ऐसा लगता है कि यहां के लोगों को भगवान ने केवल बच्चे पैदा करने के लिए ही बनाया है। इनकी बच्चा पैदा करने की रफ्तार के आगे अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियां भी नतमस्तक दिखती हैं। जितनी तेजी के साथ हमारे देश की जनसंख्या बढ़ रही है, उतनी किसी अन्य देश की नहीं। कुछ सोशल वेबसाइटों का अध्ययन करने पर पता चला है कि हमारे देश में सबसे अधिक जन्मदिन फरवरी महीने में मनाए जाते हैं। फरवरी महीने में आरकुट जैसी लोकप्रिय वेबसाइटों से जुड़े लोगों को इस दिन ढ़ेरों शुभकामना संदेश भेजने पड़ते हैं।
14 फरवरी यानी वैलेनटाइन डे युवाओं के लिए सबसे खास दिन होता है। अधिकतर युवाओं की प्रोफाइल में यही डेट जन्मदिन के रुप में दर्ज होती है। लेकिन पिछले दो एक साल से इसमें विस्तार भी देखा गया है। क्योंकि अब ढ़लती उम्र के लोग भी इसमें शामिल होने लगे हैं। कुछ बुजुर्ग लोगों का जन्ममदिन और शादी की सालगिरह भी अब इसी दिन मनाई जाती है। मेरे पड़ोस में एक चाचा जी रहते हैं। एक दिन सुबह अचानक वो मेरे घर आ टपके और कहने लगे बेटा ! आज रात का भोजन हमारे यहां करना है। मैने कहा वो सब तो ठीक है चाचाजी । पर ये बताएं आज कुछ विशेष है, क्या । वे बोले हां बेटा, आज मेरा जन्मदिन है और आज ही के दिन हमारी शादी भी हुई थी। मैने कहा लेकिन चाचाजी अभी पिछले साल तो आपने नवंबर में अपनी शादी की सालगिरह मनाई थी। इस बार डेट बदल कैसे गई। उन्होंने नजरें झुकाकर सकुचाते हुए कहा, बेटा तुम्हारी चाची का विशेष आग्रह था कि इसी दिन हम अपनी शादी की सालगिरह और जन्मदिन मनाएं । सो हमने भी स्वीकार कर लिया। फरवरी के इस खास दिन, देश के हर घर में, एक दो बच्चों का जन्मदिन जरूर मनाया जाता है। ये आंकड़े लिखित रुप में हम आरकुट जैसी लोकप्रिय वेबसाइट पर देख सकते हैं। जी हां फरवरी माह की 14 तारीख को आरकुट पर अचानक से ही जन्मदिन वालों की भीड़ लग जाती है।
जहां तक युवाओं की बात है तो देश के अधिकतर माता पिता को यह भी याद नहीं रहता कि उनका बेटा 14 फरवरी के दिन ही पैदा हुआ था। ये अलग बात है कि उस दिन उसके सजने संवरने और दोस्तों के घर आने तथा होटलों और रेस्टोरेन्ट में पार्टी होने की बात सुननने पर वो भी इस सत्य को स्वीकार करने पर मजबूर हो जाते हैं। मेरे खुद के मित्रों में लगभग दस लोग ऐसे हैं जिनका जन्मदिन 14 फरवरी को नहीं है लेकिन पिछले कई सालों से वो इसी डेट पर अपना जन्मदिन मना रहे हैं। ये अलग बात है कि प्रत्येक जन्मदिन पर उनके साथ एक नया और विशेष चेहरा देखा जाता है। मेरे एक मित्र को उसके पिछले जन्मदिन पर ढ़ेरों गिफ्ट मिले। उसने कहा यार ! ये तो बहुत बढ़िया बिजनेस है। जन्मदिन के अवसर पर मिले गिफ्ट के कारण मुझे साल भर डायरी और पेन जैसै महत्वपूर्ण चीजों के साथ-साथ जरूरत के अन्य कई सामान खरीदने नहीं पड़ते। वैलेनटाइन डे को पैदा होने वाले अपने मित्रों की लिस्ट बढ़ती देख मैने भी चार दिन पहले से ही लोगों को जन्मदिन की अग्रिम बधाईयां देनी शुरु कर दी है। साथ ही अपने मित्रों के मन में उठने वाले ज्वार भाटा को देखते हुए मेरे मन में भी बार - बार यह विचार आ रहा है कि काश ! मैं भी इसी दिन पैदा हुआ होता।

शनिवार, 25 जुलाई 2009

"सूर्य ग्रहण की यात्रा"

पता चला सदी का पहला सूर्यग्रहण लगने वाला है और यह ग्रहण फिर ३२ साल बाद लगेगा । तो हमने उसे अपने कैमरे में कैद करने की प्लानिंग शुरु कर दी मगर उस गंतव्य तक कैसे पहुँचा जाए एक बड़ी समस्या थी ।इस समस्या से निपटने की हमने कोशिस शुरु कर दी .हमारे कई जाने माने और उम्मीद लगने वाले लोगों से हमने अपने साथ ले जाने की प्रार्थना की मगर उन्होंने मना कर दिया.थक हार कर हम लोगों ने स्वतः वहां जाने का निर्णय लिया जहाँ से सूर्य ग्रहण देखा जा सकता था ... ।
ग्रहण से एक दिन पहले हम बनारस पहुँच गए जबकि हमारे सीनियर लोग प्रयाग की पवन भूमि पर उम्मीद लगाये बैठे रहे...हमने एक परिचित की शरण ली। वहां हमारी बड़ी आव भगत हुई और रात में छत पर ही सोने की व्यवस्था हुई.हम अलार्म लगाकर जल्दी सो गए क्योंकि सुबह उठकर सूर्यग्रहण की फोटो जो लेनी थी.बिना किसी तैयारी के अचानक मौसम में परिवर्तन हुआ और हमारी आशाएं धूमिल होने लगीं तभी दस मिनट के बाद मौसम फ़िर सही होने लगा और सूरज की रोशनी फ़ैल गई हमें लगा की अब हम ग्रहण देखने वालों की श्रेणी में आने वाले हैं तभी अँधेरा होने लगा .हम खुश हो गए क्योंकि ग्रहण की प्रक्रिया शुरु हो गई थी..हम विशिष्ट बनने की श्रेणी में थे क्योंकि हम ग्रहण देखने जा रहे थे .जैसे ही चंद्रमा ने सूर्य को पूरी तरह से ढका हमने वो नजारा देख लिया जिसकी हमे प्रतीक्षा थी ..जल्दी जल्दी हमने अपने कैमरे मंगाकर कुछ फोटो भी खिंची .हमारी खुशी का ठिकाना नही था क्योंकि हमने वो सभी नज़ारे देखे और कैद किए थे जिसकी कई दिनों से चर्चा हो रही थी . हमने अपनी खुशी बाँटने के लिए अपने मित्रों से बात की .मित्रों ने बताया की प्रयाग के फोटोग्राफरों को ग्रहण नहीं दिखा क्योंकि मौसम ने उनकीं तमन्नाओं पर ग्रहण लगा दिया ..वो न ही सूरज को देख सके न ग्रहण को कैद कर सके .हमें अपने उत्साह और निर्णय पर खुशी हो रही थी क्योंकि बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले याद आ रहा था ।लेकिन हमें विस्वास हो गया की इश्वर उनकी सहायता जरुर करता है जो दिल में कपट नहीं रखते हैं..जिन लोगों ने हमारी इच्छाओं पर ग्रहण लगाने की कोशिश की वो ख़ुद ग्रहण के शिकार हो गए..

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

"मेरे शर्मा जी"

इलाहाबाद के कुछ मोहल्लों में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो वहाँ की आबोहवा और मिजाज की पुरनम नुमाइश पेश कर आपको आश्चर्यचकित कर जाती हैं ।आप सोच रहे होंगे ऐसा क्या होता होगा क्यों ??
जनाब ऐसा इसलिए क्योंकि उस मोहल्ले के लोगों के पहनने ओढ़ने और रहने के तरीकों पर ध्यान दिया जाए तो आप के सामने एक नई चीज उभर कर सामने आती है।उनसें से एक है गर्मी के दिनों में लोगों द्वारा पहने जाने वाले ड्रेस।कुछ लोग ऐसी अवस्था में और ऐसे कपड़ों में होते हैं कि आप देखते ही हँस पड़ेंगे या फिर आपकी आँखें खुली की खुली रह जायेगी।अगर उस अवस्था में उन्हें रैम्प पर चला दिया जाए तो बेशक तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा माहौल गुंजायमान हो जाएगा...।अब आप सोचेंगे ऐसा क्या है उनमें....??????????
तो अब मैं आप को बताता हूँ उनमें ऐसा क्या है....मेरे मोहल्ले मे एक शर्मा जी रहते हैं ।शर्मा जी सपत्नीक बृद्धावस्था में भी रोमांच की गहराई में अपनी नैय्या चला रहे हैं।शर्मा जी का छोटा सा परिवार है जिनमें दो बेटी और दो बेटे है सभी शादी शुदा हैं।मगर पिछले दो साल से शर्मा जी अपनी पत्नी के साथ ही रहते हैं शेष लोग अपने-अपने परिवार के साथ बाहर रहते हैं।शर्मा जी के घर का दरवाजा ठीक गली में खुलता है।शर्मा जी सुबह से शाम तक एक कपड़े का जंघिया पहने हुए अपने घर के दरवाजे को खोलकर बैठे रहते हैं।गली मे आने-जाने वाली हर नवयुवती और महिला को जी भर कर देखना उनकी आदत मे शुमार है।शर्मा जी अपनी झेंप मिटाने के लिए अपनी जंघिया झाड़ने का निष्फल प्रयास करते हैं।आज एक नई कन्या गली मे प्रवेश की उसे देखते ही शर्मा जी अपना चश्मा ठीक करने लगे और बेवजह की मुस्कान बिखेरने लगे।एक तो लड़की पसीने से तर बतर थी दूसरे उसे जिसके पास जाना था उसका पता नहीं मिल रहा था उपर से शर्मा जी उसे घूरे जा रहे थे।शर्मा जी उसकी कंचन काया को देखकर काफी खुश थे।मन में लाखों तमन्नाएँ हिलोरें मार रही थी तभी उस लड़की ने शर्मा जी को डांटते हुए कहा शर्म नहीं आती एक तो लगभग नंगे बैठे हुए हो उपर से इतनी बुरी तरह से घूर रहे हो।तुम्हारे बहन बेटी नहीं है क्या............।बिल्कुल बेशर्मों की तरह दांत भी निकाल रहे हो।उस कंचन कामिनी ने तमाम अलंकरणों से शर्मा जी को अलंकृत कर डाला।
शर्मा जी शर्म से पानी पानी हो गए क्योंकि उस लड़की की पुरजोर आवाज ने पूरा मोहल्ला इकट्ठा कर लिया था।शर्मा जी की पत्नी भी पीछे खड़ी थीं और बोले जा रहीं थी.....।पूरा मोहल्ला उस लड़की को देख रहा था क्योंकि पहली बार शर्मा जी को किसी ने कुछ कहा था।गली की हर औरत और हर लड़की यहां तक की हर बृद्ध हर नवयुवक शर्मा जी के पहिनावे और नजरों के हाव भाव को देखकर मुस्कुराता था मगर कुछ कहता नहीं था।आज जब उस लड़की ने कहा तो सभी लोग खुश थे और शर्मा जी की हालत देखकर मुस्कुरा रहे थे । मैं अपनी बालकनी पर खड़ा यह सब देख रहा था......।अगले दिन फिर एक आश्चर्य मुझे देखने को मिला क्योंकि आज शर्मा जी पूरी बाँह का कुर्ता और पाजामा पहने हुए थे और अपने दरवाजे को आधा खोलकर अपनी पत्नी के साथ बैठे हुए थे।

गुरुवार, 7 मई 2009

आखिर कब तक !

आखिर कब तक ड्राइंगरूम पालिटिक्स चलती रहेगी.
आखिर कब तक हम एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहेंगे.
आखिर कब तक लोग एक दूसरे के खून के प्यासे रहेंगे.
आखिर कब तक संसद में कुर्सियां चलती रहेंगी.
आखिर कब तक घोटाले होते रहेंगे.
आखिर कब तक नेताओं पर बेकार में जूते फेंके जाते रहेंगे.
आखिर कब तक कुर्सियां बिकती रहेंगी.
आखिर कब तक लोग भूखों मरते रहेंगे.
आखिर कब तक वजीफे बांटकर काहिल जिन्दा रखे जायेंगे.
आखिर कब तक बेटियां सिसकती रहेंगी.
आखिर कब तक लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही चलती रहेगी.
आखिर कब तक जनता असहाय बनकर लुटती रहेगी.
क्या भारत माता के सपूतों का खून ठंढ़ा पड़ गया है.
क्या झांसी की रानी पैदा नहीं होती.
क्या गुठलियां खाकर मरने वाले हमें याद नहीं आते.
क्या हरिश्चंद्र और राम हमारी रगों में नहीं दौड़ते.
यह सब कुछ केवल सोचने और भाषण देने से नहीं बदलेगा
इसके लिए हमें एकजुट होकर अपनी ताकत को भांपकर
अपनी मातृभूमि की रक्षा का प्रण लेकर मैदान मेंउतर
पड़ना होगा तभी कुछ हो पायेगा,तभी हमारा भारत फिर
से सोने की चिड़िया और विवेकानन्द के सपनों का देश बन पायेगा..

"गाँव की मिट्टी"

चाक चौबंद हो गयीं दीवारें,खिड़कियाँ भी बंद हो गयीं ।
हवा के झोंकों से आती खुशबुएँ भी अब मंद हो गयीं ।
कल तक महकता था आँगन,आज खुशबू भी नजरबन्द हो गयीं।
सिमट गया अपनेपन का दायरा,अब चौपालें भी बंद हो गयीं।
किसी का दुःख किसी की खुशियाँ बन गयीं।
अब तो गावों में लोरी भी बंद हो गयीं।
बरसों बाद लौटा गाँव तो मिटटी ने पूछा -क्या शहर में रोटियां मिलनी बंद हो गयीं ?
बेजुबान था मैं -क्योंकि मेरी जुबान ही बंद हो गयी.......

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

चुनावी कुंभ

लोकसभा का पन्द्रहवां कुंभ आरम्भ हो चुका है ,देश के हर राज्य से चुनाव में अपनी छमता के अनुसार भक्तगण जनता को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं .कुछ लोग जनता का समर्थन पाने के लिए बिपक्षी प्रतिनिधि को कमतर बताकर अपनी उपलब्धियों का गुणगान कर रहे हैं.कुछ लोग सांप्रदायिक मुद्दों को उठाकर लोकतंत्र रुपी गंगा को गन्दा कर रहे हैं...
आजकल वरुण गाँधी टॉप पर चल रहे है,इनके प्रवचन से भाजपा लाभ उठा रही है .वरुण को ही मुद्दा बनाकर मायावती अपनी चुनावी रोटी सेंक रही हैं.माया और मेनका का द्वंद माँ की ममता पर यक्ष प्रश्न खड़े कर रहा है..ऐसे में जनता गंगा के अर्ध कलुषित जल की तरह हर किसी की गन्दगी और श्रद्धा का बोझ उठा रही है॥
जनता की अपनी समस्याएँ इसी वाकयुद्ध में खो गई हैं,जनता की समस्याओं की तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है,हर प्रत्याशी मौके का लाभ उठा कर चुनावी कुंभ में तर जाना चाहता है ..हर पार्टी जनता के वास्तविक मुद्दे को दबाने में लगी है .हर पार्टी सिर्फ़ वरुण और अल्पसंख्यक को मुद्दा बनाकर चुनाव जीतना चाहती है,इक्के दुक्के हैं जो आतंकवाद की बात कर रहे हैं शेष सब का एक ही राग है.....
अब जनता को अपने वोट का महत्व समझना होगा और अपने वोट का सही इस्तेमाल कर वास्तविक लोकतंत्र और अच्छा जनप्रतिनिधि चुनना होगा तभी इस देश और इस देश की जनता का कल्यान होगा

शनिवार, 14 मार्च 2009

"रबिवार की सुबह का सच"

रबिवार को सुबह उठते ही कमरे में झाड़ू लगाने के साथ-साथ कपड़े धोने का काम सर पर सवार दिखता है।इस दिन ब्यक्ति ठीक से सोना चाहता है मगर सो भी नहीं पाता,मस्ती करना चाहता है मगर वह भी नहीं कर पाता क्योंकि इसी दिन दोस्तों के आने का वक्त होता है.।दोस्त भी ऐसे कि खाने पर कई प्रकार के ब्यंजनों की फर्माइश करके आते हैं।ऱबिवार होने के कारण इन्कार भी नहीं कर सकते हैं,मजबूरन आपको वह करना पड़ेगा जो दोस्तों की इच्छा है।इसी दिन पेपर वाले,दूध वाले,जमादार और मकान मालिक भी पधारते हैं।
यह दिन हर नौकरी वाले के लिए दुखदायी होता है और हर शादीशुदा के लिए किसी सजा से कम नहीं होता है,क्योंकि बीवी इसी दिन शापिंग लिस्ट के साथ शापिंग की तैयारी में होती है।वह घूमती कम हैं सामान ज्यादा खरीदती हैं।पति बेचारा कूली की तरह सामान ढ़ोने का काम करता है।भूले से भी अगर मुंह से ‘बस करो’ निकल गया तो पति की सामत है।अब उसे घंटों भाषण सुनना पड़ेगा,उपर से आज के खाने का मेन्यू खराब हुआ समझो।अव्वल तो श्रीमती जी खाना बनाने वाली नहीं और अगर बनाती भी हैँ तो तहरी के अलावा कुछ और खाने को नहीं मिलने वाला।रबिवार का शेष समय उन्हें मनाने में चला जायेगा।अब भला कौन पति इतना बड़ा संकट अपने सर लेना चाहेगा,कौन अपना दिन खराब करना चाहेगा।
दूसरी तरफ कुछ का दिन बड़ी हँसी खुशी बीतता है,उनकी बीवी अच्छे पकवान भी बनाती है और ढ़ेर सारा प्यार भी उड़ेलती है।अब यह काल चक्र है या इनकी अपनी किश्मत यह तो उपर वाला ही जानता है,मगर कल सुबह हमारे और आपके साथ क्या होगा इस पर अभी से सोचना होगा.......।

मंगलवार, 10 मार्च 2009

"होली"

अमे यार,आज होली खेली जायेगी हम सोच रहे है कि हमहू एक दो पुराना कपड़ा निकाल लें ,काहे से कि होली में कपडों की सामत आ जाती है ....
पिछले साल होली में नया कपड़ा पहिन कर निकले तभी मोहल्ले के लौंडों ने रंग लगाने के लिए दौड़ा लिया रंग लगाने के साथ -साथं मेरे कपड़े भी फाड़ दिए,हमको अपने रंगे जाने का दुःख नहीं था मगर अपने नए कपड़े फट जाने का बहुत दुःख था ,इसलिए अबकी बार हम पहिले से सतर्क हो जाना चाहते हैं...........।
सुना है,अबकी चुनाव में मुलायम सिंह पैसा बाँट रहे हैं,अमे अपने हियाँ के नेता ससुरे तो एहु नहीं करते हैं,अगर ससुरे पैसा बांटते तो पौवा का काम चल जाता,अबकी बीवी से मांगे बिना होली अच्छे से मना लेते ....।
भाई धीरज रखो बहुत देर नहीं हुई है ,अभी भी मिलने का पूरा -पूरा चांस हैं।चलो भइया आप कह रहे हैं तो हम मान लेते है,वैसे हमारा भी मन कह रहा है कि अबकी होली अच्छी बीतेगी,बस इन लौंडों से किसी तरह बच जायें तो क्या कहने।तभी लौंडों की टोली को अपनी तरफ़ बढ़ते हुए देखकर बनवारी बोले .'अबे भाग रे भाग देख ससुरे फ़िर से रंग लिए इधरै आ रहे हैं...................'
'कबीर सा रराआआआआआआअ रराआआआआआआअरराआआआआआआअ रराआआआआआआअ ............